Sunday, July 6, 2014

A poem by Rajesh Joshi



तो तुम नहीं आए ,
वोह जो क़दमों की आहट ,
आती रही मेरे पीछे ,
वोह जो दिल पे थी दस्तक ,
तुम्हें पाउंगी सामने ,
जब खोलूंगी दरवाज़ा ,
वह जो था खुशबू भरा इक झोंका ,
और वोह जो था गीत ,
' तेरी हथेली से मिलती हैं जा कर ,
मेरे हाथ की अधूरी लकीरें ....',
लगा गुनगुनाया तुमने ;
सब वेहम थे मेरे ,
भ्रम थे मेरे ,
मेरे दिल की थी आरज़ूएं ,
मेरे मन की थी जूस्तजूएं ,
ज़िंदगी के मारुथळ में ,
इक मरुद्वीप बनाया मैंने ;
जानती थी कहीं न कहीं ,
तुम नहीं आओगे ,
न जाने क्या खोज रही थी ,
किसे खोज रही थी ,
जन्मों से ,
युगों से ,
सदियों से ,
तुम मिले तो लगा ,
तुम्हें ही खोज रही थी ;
नहीं , मुझे नहीं मिलना अगले जन्म ,
मुझे नहीं ख़रीदनी एक और आरज़ू ,
एक और जुस्तज़ू ,
नहीं करना कोई इंतज़ार ,
नहीं जन्मना फिर से ,
इक तिश्नगी के साथ ;
मैं दे दूँगी आहुति ,
रुखसती से पहले ,
हर ख्वाब की ,
हर तड़प की ,
हर इंतज़ार की ,
हर आरज़ू की ,
हर जुस्तजू की ;
कि मुझे अब कभी नहीं मिलना तुम से .........
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~~~~~~~~raj~~~~~~~~~~~~